छत्तीसगढ़

संघर्ष और संयम की मिसाल बनी किसानों की ऐतिहासिक जीत…

बिलाईगढ-बिलाईगढ़ तहसील अंतर्गत ग्राम मलुहा के किसानों ने आज एक ऐसी ऐतिहासिक जीत हासिल की है, जो आने वाले वर्षों तक जनआंदोलनों और लोकतांत्रिक संघर्षों की मिसाल बनी रहेगी। लगभग 24 वर्षों से लंबित पड़ा मुआवज़ा आखिरकार उन भूधारक किसानों को मिला, जिनकी ज़मीन वर्षों पहले अपर सोनिया जलाशय और सिंचाई परियोजनाओं के अंतर्गत डूब गई थी। इस न्यायसंगत परिणाम को संभव बनाने में भीम रेजिमेंट छत्तीसगढ़ के प्रदेश सचिव मनीष चेलक की भूमिका अत्यंत निर्णायक रही।
*24 वर्षों का लंबा इंतज़ार – दर्द और धैर्य की दास्तान*
मलुहा गांव के किसानों के लिए यह 24 साल केवल मुआवज़ा पाने की प्रतीक्षा का दौर नहीं था, बल्कि यह वक्त उनके जीवन की सबसे कठिन परीक्षा थी। एक ओर ज़मीन चली गई, तो दूसरी ओर सरकारी तंत्र की उपेक्षा और असंवेदनशीलता ने उनकी समस्याओं को और भी बढ़ा दिया। आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी जब एक किसान को अपने अधिकार के लिए दर-दर की ठोकरें खानी पड़ें, तो यह लोकतंत्र पर सवाल उठाता है।
इन किसानों की भूमि सिंचाई और जल संरक्षण परियोजनाओं के तहत डूब क्षेत्र में आ गई थी। ज़मीन के बदले मुआवज़ा तय हुआ, लेकिन फाइलें सरकारी दफ्तरों में धूल फांकती रहीं। पीढ़ियां बीत गईं, लेकिन न्याय नहीं मिला।
*संघर्ष की शुरुआत-भीम रेजिमेंट के मनीष चेलक की अगुवाई*
संघर्ष तब तेज़ हुआ जब 6 अगस्त 2025 से इंदिरा मार्केट परिसर, बिलाईगढ़ में भीम रेजिमेंट छत्तीसगढ़ के बैनर तले अनिश्चितकालीन धरना-प्रदर्शन शुरू हुआ। इस आंदोलन की अगुवाई प्रदेश सचिव मनीष चेलक ने की। उन्होंने ना केवल प्रशासन के समक्ष किसानों की पीड़ा को मजबूती से रखा, बल्कि आंदोलन को अनुशासित, शांतिपूर्ण और जनसहभागिता से पूर्ण भी बनाए रखा।
मनीष चेलक ने बताया कि यह आंदोलन कोई एक दिन की योजना नहीं थी, बल्कि वर्षों से चल रही नाइंसाफी के खिलाफ एक जनजागरण का परिणाम था। उन्होंने कहा,
> “हमारे लंबे संघर्ष, धैर्य और सच्ची लड़ाई ने आखिरकार परिणाम दिया। यह सिर्फ कागज़ी जीत नहीं है, बल्कि हर उस कदम की पहचान है जो हमने सत्य और न्याय के लिए उठाया।”

धरने के दौरान विभिन्न सामाजिक संगठनों, छात्र युवाओं और ग्रामीण समुदायों ने इस संघर्ष को समर्थन दिया। यह आंदोलन धीरे-धीरे एक जनलहर का रूप लेने लगा। प्रशासन पर दबाव बढ़ा और अंततः उन्हें किसानों की मांगों पर संज्ञान लेना पड़ा।
*प्रशासन की प्रतिक्रिया और मुआवज़ा वितरण*
लगातार बढ़ते जनदबाव और आंदोलन की व्यापकता को देखते हुए प्रशासन ने अंततः किसानों की मांगों को स्वीकार किया। अधिकारियों की एक विशेष बैठक आयोजित की गई जिसमें प्रभावित किसानों की सूची, दस्तावेज और लंबित फाइलों की समीक्षा की गई। इसके बाद मलुहा ग्राम के प्रभावित किसानों को मुआवज़ा जारी किया गया।जिसमे गंगाधर पिता कुंजराम 1740944(सत्रह लाख चालीस हजार नौ सौ चवालीस रुपये)
सहोद्राबाई पिता गोपाल चन्द्रनाहू 2151296(इक्कीस लाख इक्यावन हजार दो सौ छियानवे रुपये )रामानुज पिता तिहारु चन्द्रनाहू 1349712(तेरह लाख उन्चास हजार सात सौ बारह रुपये)
सरकार पिता तिहारु चन्द्रनाहू राशि 1231056(बारह लाख इकत्तीस हजार छप्पन रुपये) परदेशी पिता तिहारु चन्द्रनाहू 2346584 (तेईस लाख छियालीस हजार पांच सौ चौरासी रुपये)कलेक्टर संजय कन्नौजे के द्वारा दिया गया तब किसानों ने जब अपने हाथों में वह मुआवज़े की राशि प्राप्त की, तो आंखों से अश्रुधारा फूट पड़ी। वह सिर्फ पैसे नहीं थे-वे न्याय का प्रमाणपत्र थे, वे उन सपनों की पूर्ति का संकेत थे जिन्हें इन 24 वर्षों में उन्होंने कई बार टूटते देखा था।
यह जीत केवल मुआवज़े की नहीं, जनतंत्र की भी है
यह आंदोलन और उसकी सफलता सिर्फ भूमि मुआवज़े की प्राप्ति तक सीमित नहीं है। यह उस आत्मबल, साहस और विश्वास की भी कहानी है, जो आमजन को अपने अधिकारों के लिए लड़ने की प्रेरणा देता है।
मनीष चेलक की व्यक्तिगत भूमिका इस पूरी प्रक्रिया में बेहद उल्लेखनीय रही। उन्होंने अकेलेपन, दबाव और कई बार उपेक्षा का सामना किया, लेकिन कभी हार नहीं मानी। उनके नेतृत्व में यह संघर्ष सामूहिक बना और जनांदोलन की शक्ल में उभरा।
यह जीत उन सभी लोगों को एक प्रेरणा है, जो व्यवस्था की चुप्पी के सामने खड़े होने से डरते हैं। यह साबित करता है कि जब आम लोग संगठित होकर, शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से अपने हक की मांग करते हैं, तो व्यवस्था को सुनना ही पड़ता है।
सामाजिक संगठनों की एकजुटता
भीम रेजिमेंट के इस आंदोलन को अनेक सामाजिक, छात्र और किसान संगठनों का समर्थन मिला। क्षेत्र के बुद्धिजीवियों, अधिवक्ताओं, पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी इस न्याय संग्राम में हिस्सेदारी की।
इस आंदोलन ने साबित किया कि सामाजिक एकता और सामूहिक चेतना से कोई भी लड़ाई जीती जा सकती है। जहां व्यक्तिगत स्वार्थ और राजनीतिक हस्तक्षेप किसानों की मांगों को कमजोर करते आए हैं, वहीं यह आंदोलन बिल्कुल अलग था – यह जनता का, जनता के लिए और जनता द्वारा खड़ा किया गया आंदोलन था।
*भविष्य की दिशा-एक नई शुरुआत*
यह सफलता केवल अतीत की गलती को सुधारने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यह भविष्य के लिए एक चेतावनी और एक प्रेरणा भी है। सरकार और प्रशासन को अब यह समझना होगा कि विकास परियोजनाओं के नाम पर जनता के अधिकारों का हनन एक बहुत बड़ी सामाजिक कीमत पर होता है।
मनीष चेलक ने कहा,

> “हमारी लड़ाई अब केवल मलुहा तक सीमित नहीं रहेगी। जो भी भूधारक किसान, विस्थापित या पीड़ित हैं – हम उनके साथ खड़े रहेंगे। यह आंदोलन एक प्रतीक है कि हम अब जागरूक हैं, संगठित हैं और अपने अधिकारों के लिए हमेशा आवाज़ उठाएंगे।”
*संघर्ष, संकल्प और सफलता की गाथा*
बिलाईगढ़ के मलुहा गांव की यह कहानी आज उन सभी लोगों के लिए प्रेरणा है जो यह मान चुके हैं कि व्यवस्था के खिलाफ कुछ नहीं किया जा सकता। यह आंदोलन, मुआवज़ा प्राप्ति और उसकी पृष्ठभूमि एक स्पष्ट संदेश देती है – संघर्ष करो, संगठित रहो, और हक की लड़ाई कभी मत छोड़ो।
भीम रेजिमेंट छत्तीसगढ़ और मनीष चेलक ने यह दिखा दिया कि जब इरादे नेक हों और जनसमर्थन साथ हो, तो हर लड़ाई जीती जा सकती है।
यह सिर्फ एक मुआवज़ा नहीं-यह न्याय का पुनर्स्थापन, लोकतंत्र की जीत और जनशक्ति की पहचान है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
Latest
कुलगाम आतंकी हमले में छत्तीसगढ़ के मृत श्रमिकों के परिजनों को राज्य सरकार देगी 20-20 लाख रुपये की सहा... एनडीआरएफ एसडीआरएफ आपदा टीमों ने मिलकर डूबे कार को निकाला... विकास कार्यों और योजनाओं का क्रियान्वयन करने कलेक्टर के निर्देश... लात नाला में कार समेत बहे दम्पत्ति की खोज जारी नही मिला अब तक कुछ... सरिया तहसीलदार ने नियमानुसार पूर्वज के आधार पर किया बोन्दा कोटवार की नियुक्ति... प्रेग्नेंसी में पल रहे बच्चे का लिंग जांच अपराध... सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 के तहत किया गया बिलाईगढ़ थाना में आवेदन प्रस्तुत... फीस, पुस्तक और ड्रेस में मनमानी रेट तय करने वाले प्राइवेट स्कूलों पर होगी कार्यवाही... 20 जुलाई को होगा विशेष ग्रामसभा का आयोजन... 30 कुपोषित बच्चों का हुआ स्वास्थ्य परीक्षण, आईएमए के जिला इकाई ने लिया स्वस्थ करने का जिम्मा...