शिव महापुराण में वर्णित त्याग और सहयोग का अद्भुत प्रसंग है समुद्र मंथन की कथा…
बिलाईगढ़-ग्राम बेल्हा में चल रहे शिव महापुराण कथा के तीसरे दिन कथा व्यास बृजवासी वृंदावन वाले श्री आकाश कृष्णा ने कहा कि शिव महापुराण में वर्णित समुद्रमंथन की कथा भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय है। यह कथा देवताओं, असुरों और भगवान शिव के महान त्याग को उजागर करती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, एक समय दुर्वासा ऋषि के शाप के कारण देवताओं का बल और वैभव नष्ट हो गया था। इससे असुर शक्तिशाली हो गए और तीनों लोकों पर उनका आधिपत्य बढ़ने लगा। इस संकट से मुक्ति पाने के लिए देवताओं ने भगवान विष्णु की शरण ली।
भगवान विष्णु ने देवताओं को असुरों के साथ मिलकर अमृत प्राप्त करने हेतु समुद्रमंथन करने की सलाह दी। इसके बाद क्षीरसागर का मंथन आरंभ हुआ। मंदराचल पर्वत को मथनी और वासुकि नाग को रस्सी बनाकर देवता और असुर समुद्र को मथने लगे। यह मंथन अत्यंत कठिन और दीर्घकालीन था, जिसमें अनेक दिव्य घटनाएँ घटीं।
समुद्रमंथन के दौरान सबसे पहले भयानक विष ‘हलाहल’ उत्पन्न हुआ, जिसकी ज्वाला से संपूर्ण सृष्टि में हाहाकार मच गया। विष की तीव्रता इतनी प्रबल थी कि देवता और असुर दोनों ही भयभीत हो उठे। तब सभी ने भगवान शिव की शरण ली। सृष्टि की रक्षा और लोककल्याण की भावना से प्रेरित होकर भगवान शिव ने उस विष का पान कर लिया। माता पार्वती ने विष को उनके कंठ में ही रोक दिया, जिससे उनका कंठ नीला पड़ गया और वे ‘नीलकंठ’ कहलाए।
इसके पश्चात समुद्र से अनेक रत्न और दिव्य वस्तुएँ प्रकट हुईं, जिनमें कामधेनु, ऐरावत हाथी, कल्पवृक्ष, वरुणी, धन्वंतरि और अंत में अमृत कलश प्रमुख रहे। अमृत प्राप्त होते ही देवताओं ने अपनी शक्ति पुनः प्राप्त की और असुरों पर विजय हासिल की।
शिव महापुराण में वर्णित समुद्रमंथन की यह कथा केवल पौराणिक घटना नहीं, बल्कि यह समाज को सहयोग, धैर्य, त्याग और कर्तव्य की शिक्षा देती है। विशेष रूप से भगवान शिव का विषपान मानवता के लिए निस्वार्थ बलिदान का अनुपम उदाहरण माना जाता है। आज भी यह कथा लोगों को संकट के समय एकता और त्याग के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है।ग्रामवासी हिमांचल साहू ने श्रद्धालुओं को अधिक से अधिक संख्या में आकर कथा श्रवण करने की अपील की है।




